बस्तर रियासत की स्थापनाबस्तर रियासत की स्थापना 14वीं शताब्दी में राजा अनम देव द्वारा की गई थी। वे ओडिशा के काकतीय वंश से संबंधित थे और बस्तर आकर एक स्वतंत्र रियासत की नींव रखी। शुरू में राजधानी बर्सूर रही, जिसे बाद में जगदलपुर में स्थानांतरित किया गया।
जनजातीय संस्कृति और परंपराएँबस्तर की आत्मा उसकी आदिवासी जनजातियाँ हैं — जैसे गोंड, मुरिया, भतरा आदि। इनकी भाषा, पहनावा, लोकनृत्य और पर्व विशेष होते हैं। बस्तर दशहरा यहां का सबसे बड़ा पर्व है, जो पूरे 75 दिन तक चलता है और यह भारत का सबसे लंबा त्योहार माना जाता है।
बस्तर दशहरा: राजपरिवार की परंपरा
बस्तर दशहरा की शुरुआत राजा पुरुषोत्तम देव ने की थी और आज भी यह त्योहार राजपरिवार और जनता की सहभागिता से मनाया जाता है। यह सांस्कृतिक उत्सव जनजातीय आस्था और परंपरा का प्रतीक है।
ब्रिटिश शासन और स्वतंत्रता संग्रामअंग्रेजों के आगमन के बाद बस्तर को भी उपनिवेश बनाने का प्रयास किया गया। परंतु यहां के लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया। 1908 का बस्तर विद्रोह, जिसे भैरमगढ़ विद्रोह भी कहा जाता है, इसका प्रमाण है। इस विद्रोह का नेतृत्व गुंडाधुर ने किया था, जो आज भी बस्तर के नायक माने जाते हैं।
बस्तर का आधुनिक स्वरूप2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बस्तर उसका अभिन्न हिस्सा बन गया। आज बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपातों, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। हालांकि, नक्सलवाद की समस्या ने यहां विकास की गति को प्रभावित किया है, लेकिन सरकार और समाज दोनों इसके समाधान की दिशा में कार्यरत हैं।
निष्कर्षबस्तर केवल एक ऐतहासिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। यहां की मिट्टी, लोग और संस्कृति अद्वितीय हैं। बस्तर का इतिहास हमें सिखाता है कि कैसे आत्मनिर्भरता, संघर्ष और सांस्कृतिक गर्व एक समाज को विशेष बना सकते हैं।
जनजातीय संस्कृति और परंपराएँबस्तर की आत्मा उसकी आदिवासी जनजातियाँ हैं — जैसे गोंड, मुरिया, भतरा आदि। इनकी भाषा, पहनावा, लोकनृत्य और पर्व विशेष होते हैं। बस्तर दशहरा यहां का सबसे बड़ा पर्व है, जो पूरे 75 दिन तक चलता है और यह भारत का सबसे लंबा त्योहार माना जाता है।
बस्तर दशहरा: राजपरिवार की परंपरा
बस्तर दशहरा की शुरुआत राजा पुरुषोत्तम देव ने की थी और आज भी यह त्योहार राजपरिवार और जनता की सहभागिता से मनाया जाता है। यह सांस्कृतिक उत्सव जनजातीय आस्था और परंपरा का प्रतीक है।
ब्रिटिश शासन और स्वतंत्रता संग्रामअंग्रेजों के आगमन के बाद बस्तर को भी उपनिवेश बनाने का प्रयास किया गया। परंतु यहां के लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया। 1908 का बस्तर विद्रोह, जिसे भैरमगढ़ विद्रोह भी कहा जाता है, इसका प्रमाण है। इस विद्रोह का नेतृत्व गुंडाधुर ने किया था, जो आज भी बस्तर के नायक माने जाते हैं।
बस्तर का आधुनिक स्वरूप2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बस्तर उसका अभिन्न हिस्सा बन गया। आज बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपातों, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। हालांकि, नक्सलवाद की समस्या ने यहां विकास की गति को प्रभावित किया है, लेकिन सरकार और समाज दोनों इसके समाधान की दिशा में कार्यरत हैं।
निष्कर्षबस्तर केवल एक ऐतहासिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। यहां की मिट्टी, लोग और संस्कृति अद्वितीय हैं। बस्तर का इतिहास हमें सिखाता है कि कैसे आत्मनिर्भरता, संघर्ष और सांस्कृतिक गर्व एक समाज को विशेष बना सकते हैं।

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